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Thursday, July 25, 2013

Zindagi ke Rang (Colors of Life)


 An oldie that I posted on facebook page on March 30, 2013

ये भी क्या ज़िद है,
एक मुट्ठी में आसमान को,
बसाने की जद्दोजहद,
यूँही ज़िंदगी क्या कोई कम बेरंग है,
जो तुम बचे-ख़ुचे रंग भी,
उस आसमान को उधार देने चले हो?

एक-दो ही रंग सही,
पर हैं तो तुम्हारे पास,
फ़िर कल का क्या भरोसा,
वो तो हर पल बाज़ार में बिकता है,
मेहनत भी सबकी, सपने भी सबके,
और खामखाँ की ज़िद भी सबकी,
लेकिन 'कल' सिर्फ़ रंगीन घरों तक ही पहुँचता है।

तुम्हारी, मेरी बेरंग दुनिया,
तो सिर्फ़ आज और अभी देख सकती है,
सुन सकती है, महसूस कर सकती है,
कल तो यहाँ ब़स क़िताबों में बसता है,
रेहड़ी पर चमकदार चीज़ लगाकर,
मुट्ठी में आसमान नहीं समाता है,
उधारी पर रंग देने से,
ब्याज़ दर ब्याज़ नया रंग नहीं चढ़ जाता है।

* * *

मेहनत भी सबकी, सपने भी सबके,
और ज़िद भी सबकी,
फ़िर कल का क्या भरोसा,
वो तो हर पल बाज़ार में बिकता है,
इसलिए ही, मैं क्यों अपने हठ से पीछे हटूं?
क्यों मेरे हिस्से की ज़मीं,
और मेरे हिस्से का आसमान,
यूँही किसी को भी ले जाने दूँ?
मेरे रंग मेरे अपने हैं,
न मैं उधार पे इन्हें किसी को दे सकता हूँ,
न मुझसे कोई ये ले सकता है,
ये जद्दोजहद तो ब़स मेरे उन अपने रंगों को,
पहचानने की होड़ भर है।

फ़िर क्या पता मेरे रंगों को,
ढूंढता हुआ कोई 'कल' ख़ुद यहाँ आ जाए,
और अगर नहीं भी आया तो क्या पता,
मेरे रंग और चमकदार हो जाएँ,
मेरी ज़मीन और मेरा आसमान,
रंगीन घर भी बनवा पाएं,
वर्ना तो ज़िंदगी ऐसे भी कम बेरंग नहीं !


Copyright © 2013 Ankita Kashyap

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